यह तो खबर थी कि जिले के बड़े साब आज उनके स्टे हॉम में आने वाले थे लेकिन यह सपने में भी नहीं सोचा था कि बड़े साब उनके साथ काफी देर तक बात करेंगे और उनके साथ आई गुड़िया उनके लिए ढेर सारे ईनाम लेकर आएंगी।सर्व शिक्षा अभियान के विकास खण्ड राजसमन्द की ओर से राजनगर में झुग्गी झोंपडी में रहने वाले व कचरा बिनने वाले बच्चांð के लिए चलाए जा रहे स्टे होम में रहने वाले अधिकांश बच्चों के होंठो पर यही बात थी। जिला कलक्टर नवीन जैन स्टे हॉम में अपनी पत्नी श्रीमती सुनीता जैन, पुत्री आकांक्षा के साथ पहुंचे। जिला कलक्टर जैन ने वहां बालकों से करीब डेढ़ घंटे तक बातचीत की। नवीन जैन ने बच्चांð से जीवन में व्यवहारिकता व शिक्षा का परस्पर संबंध बताते हुए बच्चांð को जीवन में ईमानदार सच्चा व मेहनती होने की बात कहीं। जैन ने बच्चांð को शिक्षा के प्रति जागरूक होने व शारीरिक साफ-सफाई के प्रति ध्यान रखने के लिए कहा। जिला कलक्टर जैन की पुत्री आकांक्षा का जन्मदिन होने से उन्होने स्टे होम के सभी बच्चों के लिए नए कपड़े, स्कूल डेसे व पानी की केम्पर वितरित की। जैन ने बच्चों को जन्मदिन का मतलब भी समझाया। इस अवसर पर जिला परियोजना समन्वयक शंकर लाल सनाढय, खण्ड संदर्भ केन्द्र प्रभारी महेन्द्र सिंह झाला, संदर्भ व्यक्ति रूपेश पालीवाल भी मौजूद थे।व्यावहारिक ज्ञान देवे : जिला कलक्टर नवीन जैन ने विद्यालय के स्टाफ से अध्यापन के दौरान बच्चांð में व्यवहारिक ज्ञान देने की बात पर जोर दिया ताकि ये बच्चे अपने साथ-साथ अपने घर वालें का भी ध्यान रख सके। उन्होने विद्यालय भवन का अवलोकन किया। बच्चांð के बैठने की जगह, खाना बनाने वाली जगह, पढाई का कमरा व स्टेशनरी का अवलोकन किया। उन्होने स्टाफ को निर्देशित किया कि हर माह के एक गुरूवार को यहां केन्द्र पर नाई बुलाकर इनके बाल कटवाए जावें व इन्हें साफ-सफाई से रहना सिखाया जाए।पुलिस बनने वाले के साथ मैं हूं : जिला कलक्टर नवीन जैन ने स्टे होम के बच्चों से बातचीत के दौरान पूछा कि कौन-कौन पुलिस बनना चाहता है तो मौजूद बच्चों में से दस ने हाथ खड़े किए। उन्होने चुटकी लेते हुए कहा कि जो बच्चे पुलिस बनना चाहते है मेरी तरफ से उन्हें पूरा सहयोग दूंगा।
Sunday, November 30, 2008
लालन ने द्वारकाधीश के साथ अरोगा छप्पन भोग
राजस्थान के कांकरोली शहर में तृतीय पीठ के ठाकुरजी द्वारकाधीशजी के सन्मुख छप्पन भोग अरोगने के लिये शनिवार को नवनीत प्रियाजी (लालन) एवं द्वितीय पीठ के युगल स्वरूप विट्ठलनाथजी लाव लश्कर के साथ कांकरोली पधारे।शनिवार को प्रात: करीब सवा ग्यारह बजे नवनीत प्रियाजी व विट्ठलनाथजी के स्वरूप को सुखपाल में विराजित कर पुष्पों से सुसज्जित वाहन में पधराया गया। इस दौरान तिलकायत राकेशजी महाराज, सुपुत्र विशाल बावा, द्वितीय पीठाधीश्वर कल्याण रायजी, देवकीनन्दनजी, पंचम पीठाधीश्वर विक्की बावा (कामवन), मतमत रायजी (मुम्बई) समैत अन्य गुसाई बालक परम्परागत वेशभूषा धारण कर ठाकुरजी की शोभायात्रा में चल रहे थे।श्रीनाथ बैण्ड की मधुर धुन व गोविन्द पल्टन के सशत्र जवानों के बीच चल रही शोभायात्रा में ब्रजवासी सेवाकर्मी, वैष्णव श्रृद्धालु गिरिराजधरण की जयघोष करते हुए हर्षोल्लास के साथ चल रहे थे।शोभायात्रा में श्रीनाथजी मंदिर के मुखिया नरहरि ठाकर, लालन के मुखिया नारायण बापू सांचिहर, कृष्णभण्डार के अधिकारी सुधाकर शात्री, सत्यनारायण गुर्जर, राधे गुर्जर, फतेहलाल गुर्जर, एस.एल. नागदा, प्रबन्धक दिनेश जोशी, जगदीश मडा, राधा रमण गुर्जर, ब्रजवासी सेवक संघ के अध्यक्ष दादू पहलवान, कीर्तनीया गली के पोलिया निरन्जन गुर्जर, मांगीलाल गुर्जर, मधुकान्त सनाढ्य, ललित वैरागी सहित सैंकड़ों वैष्णव शामिल रहे।ठाकुरजी का लवाजमा लाव लश्कर के साथ कांकरोली स्थित जलचक्की चौराहा पहुंचा जहां से शोभायात्रा के रूप में विट्ठल विलास बाग पहुंचा जहां नवनीत प्रियाजी व विट्ठलनाथजी ने द्वारकाधीश प्रभु के संग छप्पन भोग आरोगा। इस बीच कृष्णभण्डार के अधिकारी सुधाकर शात्री ने बताया कि दोनों स्वरूपों को छप्पन भोग अरोगाने के पश्चात पुन: नाथद्वारा लाया गया।
Saturday, November 29, 2008
लोक लुभावन घोषणाएं क्या देगी राजस्थान को
चार दिसम्बर को राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने है। प्रमुख राजनीतिक पार्टियां सहित निर्दलीय प्रत्याशी अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं को लुभाने में जुटे है। राजनीतिक पार्टियाें ने मतदाताओं को लुभाने के लिए हाल ही में अपने चुनाव घोषणा पत्र भी जारी किए है। जिनमें एक राजनीतिक पार्टी ने कर्मचारियों को सभी परिलाभ देने और प्रसूता को पांच किलो घी तक देने का आश्वासन दे डाला। वहीं दूसरी पार्टी राय और क्षेत्र के विकास के लिए हर संभल पहल करने की घोषणा कर रहे है। सवाल यह उठता है कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा जो चुनावी घोषणा पत्र जारी किया गया उसका वास्तविक साझेदार जनता है या उसके कार्यकर्ता। क्योंकि चुनाव के बाद जब राजनीतिक पार्टी सत्ता संभालती है तो चुनाव से पहले जारी किया गया उनका घोषणा पत्र समय के साथ-साथ जनता के लिए एक नेता का कागजी वादा ही साबित होकर रह जाता है। प्राय: यह भी देखा जाता है कि राजनीतिक पार्टियां वृहद स्तर पर जनता को आकर्षित करने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो कर देती है लेकिन उनमें किए गए वादे कभी पूरे नहीं हो पाते। मसलन पिछले चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों ने गांव-गांव में स्वास्थ्य केन्द्र और स्कूल खोलने के तो बडे वादे किए लेकिन क्या अभी तक सभी गांवों में स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र खुल गए? यदि खुल गए तो स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और स्वास्थ्य केन्द्र में चिकित्साकर्मी है? स्वाभाविक तौर पर इन प्रश्नों पर राजनीतिक पार्टियों के बडे नेता भी जवाबदेते नहीं बनते।
पर्यटन के क्षेत्र में राजस्थान का नाम विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त है। भारत आने वाले दस विदेशी पर्यटकों में से आठ राजस्थान की प्राचीन संस्कृति और धरोहर को देखने जरूर आते है। विदेशी लोगों के यहां आने से सत्ता में रहने वाली सरकार को वित्तीय दृष्टि से फायदा तो बहुत हुआ लेकिन कभी सरकार ने राजस्थान की प्राचीन धरोहर को संवारने और जर्जर होती पुरा सम्पदा को संजोने में कोई रूचि नहीं दिखाई। यहां तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इसे घोषणा पत्र में स्थान देना भी जरूरी नहीं समझा। यही हाल राजस्थानी भाषा का है। राजस्थानी भाषा संघर्ष समिति ने चुनाव की घोषणा से पूर्व राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से अपने घोषणा पत्र में राजस्थानी भाषा की मान्यता के सम्बन्ध में घोषणा करवाने का आग्रह किया, अपनी चुनाव प्रचार सामग्री भी राजस्थानी भाषा में प्रकाशित करवाने का आग्रह किया लेकिन अफसोस किसी पार्टी ने इस और ध्यान नहीं दिया।
पर्यटन के क्षेत्र में राजस्थान का नाम विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त है। भारत आने वाले दस विदेशी पर्यटकों में से आठ राजस्थान की प्राचीन संस्कृति और धरोहर को देखने जरूर आते है। विदेशी लोगों के यहां आने से सत्ता में रहने वाली सरकार को वित्तीय दृष्टि से फायदा तो बहुत हुआ लेकिन कभी सरकार ने राजस्थान की प्राचीन धरोहर को संवारने और जर्जर होती पुरा सम्पदा को संजोने में कोई रूचि नहीं दिखाई। यहां तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इसे घोषणा पत्र में स्थान देना भी जरूरी नहीं समझा। यही हाल राजस्थानी भाषा का है। राजस्थानी भाषा संघर्ष समिति ने चुनाव की घोषणा से पूर्व राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से अपने घोषणा पत्र में राजस्थानी भाषा की मान्यता के सम्बन्ध में घोषणा करवाने का आग्रह किया, अपनी चुनाव प्रचार सामग्री भी राजस्थानी भाषा में प्रकाशित करवाने का आग्रह किया लेकिन अफसोस किसी पार्टी ने इस और ध्यान नहीं दिया।
लम्बी बीमारी से निजात मिली श्रीलाल को
राजस्थान राय के राजसमन्द जिले की आमेट तहसील के गांव लावासरदारगढ निवासी मांगीलाल खटीक एवं श्रीमती बसन्ती के परिवार में शनिवार का दिन नई रोशनी लेकर आया जब उनके तेरह वर्षीय एकलोते पुत्र श्रीलाल खटीक का ऑपरेशन राजसमन्द जिला कलक्टर नवीन जैन और भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी के मानद सचिव राजकुमार दक के प्रयासों से हो गया।
आठवीं कक्षा मे अध्ययनरत श्रीलाल लम्बे समय से फेफड़े की बीमारी हाइडेटिड सिस्ट से ग्रसित था। मजदूरी से पेट भरने वाला परिवार आर्थिक बोझ तले जैसे तैसे स्थानीय चिकित्सको से इलाज करवा रहा था लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। पिछले दिनाें परिजनाें ने राजकुमार दक से सम्पर्क करने पर उन्होने कमला नेहरू चिकित्सालय के डॉ भूपेश परतानी एवं आरके चिकित्सालय के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ललित पुरोहित से चिकित्सा परामर्श लिया। सोनोग्राफी करने पर मालूम चला कि बालक के दाएं फेफडे में पानी भरा पड़ा है एवं सिकुड़ गया है जिसका इलाज ऑपरेशन से ही सम्भव है एवं वह उदयपुर(राजस्थान) हो सकता था।
ऐसी स्थिति में दक ने उन्हें महाराणा भूपाल चिकित्सालय के ह्दय रोग विशेषज्ञ डॉ विनय नैथानी के पास भिजवाया जिन्होनें एक घंटे के अथक परिश्रम से उसके फेफडे के पास बनी पानी की थेली को शल्य चिकित्सा कर बाहर निकाली एवं फेफडे को सामान्य तरह से कार्य करने योग्य फुलाया। दक ने बताया कि इस ऑपरेशन में डॉ नैथानी ने पूर्ण मानवीयता का परिचय दिया एवं तुरन्त ऑपरेशन कर हर सम्भव सहयोग प्रदान किया।
डॉ नैथानी के अनुसार बालक को समय पर इलाज मिल जाने से उसकी जान बच गई अन्यथा ऐसे प्रकरण में थेली फटने पर टोक्सीन शरीर में फैल जाता है जिससे रोगी की मृत्यु तक हो जाती है।
आठवीं कक्षा मे अध्ययनरत श्रीलाल लम्बे समय से फेफड़े की बीमारी हाइडेटिड सिस्ट से ग्रसित था। मजदूरी से पेट भरने वाला परिवार आर्थिक बोझ तले जैसे तैसे स्थानीय चिकित्सको से इलाज करवा रहा था लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। पिछले दिनाें परिजनाें ने राजकुमार दक से सम्पर्क करने पर उन्होने कमला नेहरू चिकित्सालय के डॉ भूपेश परतानी एवं आरके चिकित्सालय के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ललित पुरोहित से चिकित्सा परामर्श लिया। सोनोग्राफी करने पर मालूम चला कि बालक के दाएं फेफडे में पानी भरा पड़ा है एवं सिकुड़ गया है जिसका इलाज ऑपरेशन से ही सम्भव है एवं वह उदयपुर(राजस्थान) हो सकता था।
ऐसी स्थिति में दक ने उन्हें महाराणा भूपाल चिकित्सालय के ह्दय रोग विशेषज्ञ डॉ विनय नैथानी के पास भिजवाया जिन्होनें एक घंटे के अथक परिश्रम से उसके फेफडे के पास बनी पानी की थेली को शल्य चिकित्सा कर बाहर निकाली एवं फेफडे को सामान्य तरह से कार्य करने योग्य फुलाया। दक ने बताया कि इस ऑपरेशन में डॉ नैथानी ने पूर्ण मानवीयता का परिचय दिया एवं तुरन्त ऑपरेशन कर हर सम्भव सहयोग प्रदान किया।
डॉ नैथानी के अनुसार बालक को समय पर इलाज मिल जाने से उसकी जान बच गई अन्यथा ऐसे प्रकरण में थेली फटने पर टोक्सीन शरीर में फैल जाता है जिससे रोगी की मृत्यु तक हो जाती है।
Wednesday, November 26, 2008
सरहदों से पार आई संगीत की बहार
पंछी को उड़ने से, नदी को बहने तथा पवन के झोंकों को कोई सरहद नहीं रोक सकती, उसी तरह संगीत के जादू को भी कोई सरहदी दीवार नहीं रोक सकती। संगीत का जादू सात समुद्र पार से भी लोगों को अपने ओर आकर्षित कर लेता है।
संगीत का यही जादू इन दिनों नजमुल निशा को जर्मनी से उदयपुर खींच लाया। लेखिका और पेशे से पत्रकार नजमुल भारतीय क्लासिकल संगीत से बहुत प्रभावित है। उन्होंने भारतीय क्लासिकल म्युजिक के व्यापक प्रचार प्रचार के लिए बर्लिन में टैगोर इंसटिनी अकादमी भी खोल रखी है। बांगला भाषी नजमुल ने भारत में खुद को प्यारी का उपनाम दिया है। ढाका में जन्मी नजमुल निशा ने बांगलादेश की बुलबुल अकादमी से टैगोर संगीत की बारिकियां सीखी। सन 1980 में बर्लिन में बतौर रेडियो जर्नलिस्ट काम करने का सोचा और जर्मन रेडियों एण्ड टेलीविजन में एडिटर का पद संभाला। इसके बाद भी वह अपने संगीत प्रेम को नहीं छोड़ पाई। उन्होंने बांगला में कई कविताएं भी लिखी। कविताओं की क्वालिटी के दम पर पिछले वर्ष जून माह में लंदन पोयट्री फेस्टीवल तथा इससे पहले न्यूयार्क के बुक फेयर में भाग लिया। हाल ही में कोलकता में आयोजित फिल्म फेस्टीवल में बतौर विशिष्ट अतिथि शरीक हुई।
नजमूल ने उदयपुर स्थित बोस म्यूजिक एकेडमी के बारे में अपने कई जर्मन दोस्तों से सुना तो सम्पर्क किया और वह इसके संस्थापक पंडित आरके बोस से मिलने उदयपुर आई। नजमूल ने बताया कि जर्मनी में इंडियन क्लासिकल म्यूजिक तथा सितार व तबला जैसे वाद्ययंत्रों को सिखाने के लिए यादा रुचि लेते है। उनके संस्थान में भारतीयों के मुकाबले स्थानीय लोगों की संख्या यादा है। स्वतंत्र पत्रकार के रूप में न्यूयार्क और कोलकता के विभिन्न समाचार पत्रों में लिखने वाली नजमूल निशा लेखन और अनुवाद में रुचि रखती है। सन 2005 में साहित्य नोबल पुरस्कार विजेता एल्फ्रेडो जोलिनेक के उपन्यास को इन दिनों वह बांगला में अनुवादित कर रही है।
संगीत का यही जादू इन दिनों नजमुल निशा को जर्मनी से उदयपुर खींच लाया। लेखिका और पेशे से पत्रकार नजमुल भारतीय क्लासिकल संगीत से बहुत प्रभावित है। उन्होंने भारतीय क्लासिकल म्युजिक के व्यापक प्रचार प्रचार के लिए बर्लिन में टैगोर इंसटिनी अकादमी भी खोल रखी है। बांगला भाषी नजमुल ने भारत में खुद को प्यारी का उपनाम दिया है। ढाका में जन्मी नजमुल निशा ने बांगलादेश की बुलबुल अकादमी से टैगोर संगीत की बारिकियां सीखी। सन 1980 में बर्लिन में बतौर रेडियो जर्नलिस्ट काम करने का सोचा और जर्मन रेडियों एण्ड टेलीविजन में एडिटर का पद संभाला। इसके बाद भी वह अपने संगीत प्रेम को नहीं छोड़ पाई। उन्होंने बांगला में कई कविताएं भी लिखी। कविताओं की क्वालिटी के दम पर पिछले वर्ष जून माह में लंदन पोयट्री फेस्टीवल तथा इससे पहले न्यूयार्क के बुक फेयर में भाग लिया। हाल ही में कोलकता में आयोजित फिल्म फेस्टीवल में बतौर विशिष्ट अतिथि शरीक हुई।
नजमूल ने उदयपुर स्थित बोस म्यूजिक एकेडमी के बारे में अपने कई जर्मन दोस्तों से सुना तो सम्पर्क किया और वह इसके संस्थापक पंडित आरके बोस से मिलने उदयपुर आई। नजमूल ने बताया कि जर्मनी में इंडियन क्लासिकल म्यूजिक तथा सितार व तबला जैसे वाद्ययंत्रों को सिखाने के लिए यादा रुचि लेते है। उनके संस्थान में भारतीयों के मुकाबले स्थानीय लोगों की संख्या यादा है। स्वतंत्र पत्रकार के रूप में न्यूयार्क और कोलकता के विभिन्न समाचार पत्रों में लिखने वाली नजमूल निशा लेखन और अनुवाद में रुचि रखती है। सन 2005 में साहित्य नोबल पुरस्कार विजेता एल्फ्रेडो जोलिनेक के उपन्यास को इन दिनों वह बांगला में अनुवादित कर रही है।
Sunday, November 23, 2008
जन्मजात नेत्रहीन अनिता को मिला नया जीवन
राजस्थान राज्य के राजसमन्द जिलान्तर्गत रेलमगरा तहसील के बनेडिया गांव निवासी लालू जोगी ने कभी सपने में नहीं सोचा कि उसकी दस वर्षीय नेत्रहीन पुत्री अनिता कभी इस दुनियां को देख पाएगी लेकिन उसकी खुशी का ठिकाना तब नहीं रहा जब उसकी जन्मजात नेत्रहीन इस बालिका का सफल ऑपरेशन सर्व शिक्षा अभियान राजसमन्द और भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी जिला शाखा के मानद सचिव राजकुमार दक के प्रयासा से हो गया और अब अनिता अपनी दोनो आंखो से देख पा रही है। अनिता के नाना मांगीलाल बतातें हैं कि वह जन्म से ही नहीं देख पाती थी। हमने कुछ जगह इसको बताई लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण और इलाज के लिए नहीं जा पाए न ही हमे कोई जानकारी मिली कि इस तरह का इलाज हो सकेगा। पिछले दिना जब सर्व शिक्षा अभियान राजसमन्द और रेडक्रॉस सोसायटी के मानद सचिव राजकुमार दक के सम्पर्क में आए तो इन्होने पूरी मदद के लिए भरोसा दिलाया।
सितम्बर माह में जिला कलक्टर नवीन जैन ने सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत ऐसे बालका को चिन्हित करने के निर्देश दिए जिन्हें विशिष्ट आवश्यकता है। ऐसे में सर्व शिक्षा के जिला परियोजना समन्वयक शंकर लाल सनाढय व सन्दर्भ शिक्षक प्रमेन्द्र जावडिया के मार्फत बालिका अनिता की जानकारी मिली तो उन्होने तुरन्त ही बालिका को परामर्श के लिए अलख नयन नेत्र मंदिर उदयपुर (राजस्थान) के चिकित्सक डॉ एचएस चुण्डावत के पास एम्बूलेंस से भिजवाया जहां डॉ चुण्डावत एवं डॉ एल एस झाला ने उपचार शुरू किया। फेको पध्दति से 23 अक्टूबर को एक आंख का ऑपरेशन किया गया तो परिजनो की खुशी का पारावार नहीं रहा जब पट्टी खुलने पर पहली बार उसने इस दुनियां को देखा। उसकी दूसरी आंख का ऑपरेशन 17 नवम्बर को किया गया और यह भी पूर्णत: सफल रहा। अनिता से पहले अंगुलिया की गिनती करवाई गई अब अनिता दोनो आंखो से सकुशल देख रही है। अनिता के परिजनों की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए अलख नयन मंदिर के डॉ एचएस चुण्डावत ने ऑपरेशन खर्च लगभग पच्चीस हजार रुपया पूर्णत: माफ कर दिया। डॉ चुण्डावत का कहना है कि ऐसे रोगी अज्ञानतावश एवं आर्थिक तंगी से अपना समुचित इलाज नहीं करवा पाते है। यदि इसका ऑपरेशन कुछ वर्ष पूर्व हो जाता तो उसकी नजर की गुणवत्ता और अच्छी होती। अनिता को रोशनी मिलने पर पूरे परिवार व स्कूल में खुशी का माहौल है।राजकुमार दक ने बताया कि जिला कलक्टर नवीन जैन की प्रेरणा पर ऐसे और बच्चों की पहचान कर उनके समुचित इलाज की व्यवस्था की जा रही है।
सितम्बर माह में जिला कलक्टर नवीन जैन ने सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत ऐसे बालका को चिन्हित करने के निर्देश दिए जिन्हें विशिष्ट आवश्यकता है। ऐसे में सर्व शिक्षा के जिला परियोजना समन्वयक शंकर लाल सनाढय व सन्दर्भ शिक्षक प्रमेन्द्र जावडिया के मार्फत बालिका अनिता की जानकारी मिली तो उन्होने तुरन्त ही बालिका को परामर्श के लिए अलख नयन नेत्र मंदिर उदयपुर (राजस्थान) के चिकित्सक डॉ एचएस चुण्डावत के पास एम्बूलेंस से भिजवाया जहां डॉ चुण्डावत एवं डॉ एल एस झाला ने उपचार शुरू किया। फेको पध्दति से 23 अक्टूबर को एक आंख का ऑपरेशन किया गया तो परिजनो की खुशी का पारावार नहीं रहा जब पट्टी खुलने पर पहली बार उसने इस दुनियां को देखा। उसकी दूसरी आंख का ऑपरेशन 17 नवम्बर को किया गया और यह भी पूर्णत: सफल रहा। अनिता से पहले अंगुलिया की गिनती करवाई गई अब अनिता दोनो आंखो से सकुशल देख रही है। अनिता के परिजनों की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए अलख नयन मंदिर के डॉ एचएस चुण्डावत ने ऑपरेशन खर्च लगभग पच्चीस हजार रुपया पूर्णत: माफ कर दिया। डॉ चुण्डावत का कहना है कि ऐसे रोगी अज्ञानतावश एवं आर्थिक तंगी से अपना समुचित इलाज नहीं करवा पाते है। यदि इसका ऑपरेशन कुछ वर्ष पूर्व हो जाता तो उसकी नजर की गुणवत्ता और अच्छी होती। अनिता को रोशनी मिलने पर पूरे परिवार व स्कूल में खुशी का माहौल है।राजकुमार दक ने बताया कि जिला कलक्टर नवीन जैन की प्रेरणा पर ऐसे और बच्चों की पहचान कर उनके समुचित इलाज की व्यवस्था की जा रही है।
Saturday, November 22, 2008
मीडिया जनमत जगा रहा है या जनमत को बरगला रहा है
विधान सभा चुनाव में एक सजग और सार्वजनिक समस्याओं के प्रति संवेदनशील प्रत्याशी चयनित हो इसके लिए स्वयंसेवी संगठनों द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जाता है। राजस्थान के प्रमुख दैनिक राजस्थान पत्रिका ने भी जन भावना अनुरूप जागो जनमत के माध्यम से अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है जो वास्तव में सराहनीय कार्य है। समाचार पत्र और मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है क्योंकि वह दिन-प्रतिदिन लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ के बारे में सही और प्रमाणिक जानकारी देकर सजग करने में भूमिका का निर्वाह करता है। यही वजह है कि समाचार पत्र में प्रतिदिन सरकार के अच्छे कार्यो को जहां तरजीह दी जाती है वही सरकार के मंत्रियों और सरकारी अधिकारी व कर्मचारी वर्ग द्वारा किए गए बुरे कार्यो की भी पोल खोल दी जाती है। विगत डेढ़ दशक में इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से बड़े से बडे भ्रष्टाचार का खुलासा किया है।
बात यहां लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ समाचार पत्र और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर से निभाई जा रही प्रामाणिक भूमिका की नहीं है। यहां बात हो रही है पूर्णतया व्यावसायिक बनते जा रहे मीडिया की भूमिका के बारे में है। विधानसभा चुनाव का दौर चल रहा है ऐसे में मीडिया के विज्ञापन प्रतिनिधि चुनाव में खडे हुए प्रत्याशी से विज्ञापन लेते है या प्रत्याशी के विज्ञापन प्रकाशित करते है। इसमें कोई बुराई नहीं है। चूंकि यह सर्वमान्य है कि समाचार पत्र और मीडिया विज्ञापन की कमाई से अपना अधिकांश व्यय समायोजित करते है। विधानसभा चुनाव हो या नहीं हो दीपावली, होली या अन्य कोई विशेष अवसर पर समाचार पत्र विज्ञापन के परिशिष्ट निकालने की परम्परा चल पडी है जो भी बुरी बात नहीं है क्याेंकि जनता समाचारों के साथ विज्ञापन का महत्व समझने लगी है।
राजस्थान के विधानसभा चुनावों में मीडिया के कतिपय लोगों ने एक और नई परिपाटी शुरू की है। जिसका उदाहरण प्रतापगढ जिले के बड़ी सादडी विधानसभा क्षेत्र में गत दिनों एक प्रत्याशी ने पेश किया। प्रत्याशी ने एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया और उसमें अपने प्रचारात्मक सामग्री देते हुए प्रत्येक पत्रकार से उसे छापने का आह्वान किया। सम्मेलन में शरीक हुए पत्रकारों के मुताबिक प्रत्येक पत्रकार को उक्त प्रचार सामग्री प्रकाशन के लिए हजारों रुपए भी दिए गए। हालांकि एक बडे समाचार पत्र के प्रतिनिधि ने प्रत्याशी द्वारा दिए गए रुपए का विरोध करते हुए वापस उसी को लौटा दिए। उक्त प्रतिनिधि ने इस सम्बन्ध में अपनी समाचार डेस्क को अवगत भी कराया, जिस पर इस बडे समाचार पत्र ने पूरे राय के सभी संस्करणों के सम्पादकों को समाचार पत्र की आचार संहिता का उल्लेख करते हुए निर्देशित किया कि इस प्रकार की प्रचारात्मक सामग्री छापने से बचे। बतौर विज्ञापन भी उस प्रत्याशी को जनता का भगवान बनाने का प्रयास नहीं किया जाएं।
यहां तो बात उस समाचार पत्र की हुई जिसने मीडिया की आचार संहिता के मुताबिक ऐसे प्रचारात्मक तरीके को रोकने का प्रयास किया लेकिन बडी सादडी में घटी घटना का दूसरा दु:खद पहलु यह भी रहा कि कई समाचार पत्रों ने अपवादों को छोड़ दे तो उक्त प्रत्याशी की प्रचारात्मक सामग्री को हुबहु छाप दिया। हो सकता है कई पाठक और मीडियाकर्मी इस पर अपनी यह राय दे कि यह तो पहले भी चल रहा था इसमें नया क्या है? तो यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि चुनाव के दौरान पहले प्रत्याशी छोटे-छोटे समाचार पत्र जिनमें से अधिकांश उनकी रहमोकरम पर चल रहे है वे ही उनकी प्रचार सामग्री को छापते थे लेकिन अब इसका रूप बदलने लगा है।
बड़ी सादडी में प्रत्याशी द्वारा की गई एक तुच्छ हरकत ने कतिपय मीडियाकर्मी को इस चुनाव में उपरी तौर पर अच्छी कमाई करने का मार्ग प्रशस्त भी कर दिया। इस घटना के बाद कतिपय मीडियाकर्मी उक्त प्रत्याशी के अलावा संभाग के विधानसभा क्षेत्रों मे खडे प्रत्याशी से मिलने-जुलने का काम शुरू कर दिया। प्रत्याशी के प्रचारात्मक एक पृष्ठ सामग्री के लिए लाखों रुपए के सौदे भी किए जा रहे है। कतिपय मीडियाकर्मी इन प्रत्याशियों से यह भी कहते नजर आते है कि विज्ञापन के तौर पर भी उनकी प्रचारात्मक सामग्री लग सकती है लेकिन इसमें जो व्यय होगा वह उसके चुनाव खर्च में जुडेग़ा और इसका नुकसान भी उसे होगा। विधानसभा चुनाव में खडे होने वाले प्रत्याशी को अधिकतम दस लाख रुपए खर्च करने की अनुमति है। स्वाभाविक तौर पर प्रत्याशी अधिकतम दस लाख रुपए से कई गुना अधिक खर्च करते है लेकिन खर्चा पेश करते वक्त दस लाख से कम के बिल और अन्य दस्तावेज पेश करते है। कतिपय मीडियाकर्मी इस कमजोरी का फायदा उठा कर अपनी स्वार्थ सिध्द कर रहे है।
मीडिया में पाठक समाचार इसलिए पढ़ते और देखते है ताकि वह अपनी राय बना सके लेकिन इस तरह किसी प्रत्याशी का डंका बजाना क्या न्यायोचित है? क्या इसके माध्यम से समाचार पत्र जनमत को जगा सकेंगे?
बात यहां लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ समाचार पत्र और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर से निभाई जा रही प्रामाणिक भूमिका की नहीं है। यहां बात हो रही है पूर्णतया व्यावसायिक बनते जा रहे मीडिया की भूमिका के बारे में है। विधानसभा चुनाव का दौर चल रहा है ऐसे में मीडिया के विज्ञापन प्रतिनिधि चुनाव में खडे हुए प्रत्याशी से विज्ञापन लेते है या प्रत्याशी के विज्ञापन प्रकाशित करते है। इसमें कोई बुराई नहीं है। चूंकि यह सर्वमान्य है कि समाचार पत्र और मीडिया विज्ञापन की कमाई से अपना अधिकांश व्यय समायोजित करते है। विधानसभा चुनाव हो या नहीं हो दीपावली, होली या अन्य कोई विशेष अवसर पर समाचार पत्र विज्ञापन के परिशिष्ट निकालने की परम्परा चल पडी है जो भी बुरी बात नहीं है क्याेंकि जनता समाचारों के साथ विज्ञापन का महत्व समझने लगी है।
राजस्थान के विधानसभा चुनावों में मीडिया के कतिपय लोगों ने एक और नई परिपाटी शुरू की है। जिसका उदाहरण प्रतापगढ जिले के बड़ी सादडी विधानसभा क्षेत्र में गत दिनों एक प्रत्याशी ने पेश किया। प्रत्याशी ने एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया और उसमें अपने प्रचारात्मक सामग्री देते हुए प्रत्येक पत्रकार से उसे छापने का आह्वान किया। सम्मेलन में शरीक हुए पत्रकारों के मुताबिक प्रत्येक पत्रकार को उक्त प्रचार सामग्री प्रकाशन के लिए हजारों रुपए भी दिए गए। हालांकि एक बडे समाचार पत्र के प्रतिनिधि ने प्रत्याशी द्वारा दिए गए रुपए का विरोध करते हुए वापस उसी को लौटा दिए। उक्त प्रतिनिधि ने इस सम्बन्ध में अपनी समाचार डेस्क को अवगत भी कराया, जिस पर इस बडे समाचार पत्र ने पूरे राय के सभी संस्करणों के सम्पादकों को समाचार पत्र की आचार संहिता का उल्लेख करते हुए निर्देशित किया कि इस प्रकार की प्रचारात्मक सामग्री छापने से बचे। बतौर विज्ञापन भी उस प्रत्याशी को जनता का भगवान बनाने का प्रयास नहीं किया जाएं।
यहां तो बात उस समाचार पत्र की हुई जिसने मीडिया की आचार संहिता के मुताबिक ऐसे प्रचारात्मक तरीके को रोकने का प्रयास किया लेकिन बडी सादडी में घटी घटना का दूसरा दु:खद पहलु यह भी रहा कि कई समाचार पत्रों ने अपवादों को छोड़ दे तो उक्त प्रत्याशी की प्रचारात्मक सामग्री को हुबहु छाप दिया। हो सकता है कई पाठक और मीडियाकर्मी इस पर अपनी यह राय दे कि यह तो पहले भी चल रहा था इसमें नया क्या है? तो यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि चुनाव के दौरान पहले प्रत्याशी छोटे-छोटे समाचार पत्र जिनमें से अधिकांश उनकी रहमोकरम पर चल रहे है वे ही उनकी प्रचार सामग्री को छापते थे लेकिन अब इसका रूप बदलने लगा है।
बड़ी सादडी में प्रत्याशी द्वारा की गई एक तुच्छ हरकत ने कतिपय मीडियाकर्मी को इस चुनाव में उपरी तौर पर अच्छी कमाई करने का मार्ग प्रशस्त भी कर दिया। इस घटना के बाद कतिपय मीडियाकर्मी उक्त प्रत्याशी के अलावा संभाग के विधानसभा क्षेत्रों मे खडे प्रत्याशी से मिलने-जुलने का काम शुरू कर दिया। प्रत्याशी के प्रचारात्मक एक पृष्ठ सामग्री के लिए लाखों रुपए के सौदे भी किए जा रहे है। कतिपय मीडियाकर्मी इन प्रत्याशियों से यह भी कहते नजर आते है कि विज्ञापन के तौर पर भी उनकी प्रचारात्मक सामग्री लग सकती है लेकिन इसमें जो व्यय होगा वह उसके चुनाव खर्च में जुडेग़ा और इसका नुकसान भी उसे होगा। विधानसभा चुनाव में खडे होने वाले प्रत्याशी को अधिकतम दस लाख रुपए खर्च करने की अनुमति है। स्वाभाविक तौर पर प्रत्याशी अधिकतम दस लाख रुपए से कई गुना अधिक खर्च करते है लेकिन खर्चा पेश करते वक्त दस लाख से कम के बिल और अन्य दस्तावेज पेश करते है। कतिपय मीडियाकर्मी इस कमजोरी का फायदा उठा कर अपनी स्वार्थ सिध्द कर रहे है।
मीडिया में पाठक समाचार इसलिए पढ़ते और देखते है ताकि वह अपनी राय बना सके लेकिन इस तरह किसी प्रत्याशी का डंका बजाना क्या न्यायोचित है? क्या इसके माध्यम से समाचार पत्र जनमत को जगा सकेंगे?
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