Friday, January 2, 2009

मंगल पर उपग्रह 2013 में

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक के राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि भारत 2013-16 तक मंगल ग्रह पर एक उपग्रह भेज सकता है।नायर सर्विस सोसायटी के संस्थापक नेता मन्नतु पद्मनाभन के 132 वें जयंती समारोह का उद्घाटन करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि वर्ष 2020 तक चंद्रमा पर मानव भेजने की तैयारियां चल रही हैं और इससे पहले 2015 तक सात दिन के लिए अंतरिक्ष में दो लोग भेजे जाएंगे।उन्होंने कहा कि चंद्रयान प्रथम अभियान ने साबित कर दिया कि यदि किसी संगठन के सदस्य एक दृष्टि के साथ काम करते हैं तो सब कुछ संभव है। राधाकृष्णन ने छात्रों से धन कमाने वाले पाठ्यक्रम अपनाने की बजाय विज्ञान और इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम में दाखिला लेने का आह्वान किया जो देश के लिए हितकर है।

Thursday, January 1, 2009

किलीनोची पर श्रीलंका के सैनिक का कब्ज़ा

पिछले एक दशक में पहली बार श्रीलंका के सैनिक तमिल विद्रोहियों के प्रशासनिक मुख्यालय किलीनोची में दाख़िल हुए हैं. एलटीटीई की तरफ़ से इस पर कोई बयान नहीं आया है
श्रीलंका के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि उसके सैनिकों ने शहर में कदम रखा है और उन्होंने शहर के उत्तरी भाग में स्थित एक महत्वपूर्ण सड़क काराडिपोक्कु पर कब्ज़ा कर लिया है
लगभग दस साल पहले तमिल विद्रोही संगठन लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) ने इस शहर पर कब्ज़ा कर इसे अपना प्रशासनिक मुख्यालय बनाया था कई महीनों से श्रीलंका की सेना तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई के कड़े विरोध के बावजूद किलीनोची पर कब्ज़ा जमाने के लिए भीषण संघर्ष कर रही थी एलटीटीई की तरफ़ से इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन विद्रोहियों ने पिछले हफ़्ते कहा था कि वे सफलतापूर्वक शहर का बचाव कर रहे हैं पिछले कुछ महीनों में दोनों पक्षों ने देश के उत्तरी भाग में जारी लड़ाई में एक दूसरे को भारी क्षति पहुँचाई है ग़ौरतलब है कि श्रीलंका की सेना ने हाल में किलीनोची के उत्तर में स्थित पारंथन क़स्बे को घेर लिया था जो तमिल विद्रोहियों के लिए सामरिक महत्व का है सेना ने वहाँ हुई लड़ाई में कम से कम 50 तमिल विद्रोहियों के मारे जाने का दावा भी किया था श्रीलंका में अल्पसंख्यक तमिल पिछले दो दशक से अधिक समय से अलग राज्य की माँग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं

वह मर गया लेकिन डॉक्टरों ने उसे जीवित कर दिया

इसे विज्ञान का चमत्कार कहें या किस्मत का खेल कि 68 साल की उम्र वाले एक मरीज का हृदय. फेंफडे और अन्य जरूरी अंग काम करना बंद कर देने के बाद भी एक सप्ताह के भीतर डाक्टरों के अथक प्रयास से उसकी हालत में आश्चर्यजनक सुधार हुआ है।इंदौर के सीएचएल अपोलो अस्पताल में 24 दिसंबर को मरणासन्न स्थिति में गुलाब चंद डोंगरे जब भर्ती कराया गया तब वह पूरी तरह से अचेत अवस्था थे और आंख भी नहीं खोल पा रहे थे। मशीनें भी उनकी नब्ज तथा रक्तचाप नापने में असमर्थ साबित हुई । ईसीजी मशीन ने उनके हृदय को पूरी तरह से ब्लॉक बता दिया।अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ डा. नितिन मोदी और डा.सुधीर खेतावत के नेतृत्व में चिकित्सकों के एक दल ने डोंगरे को बचाने की अंतिम कोशिश के तहत उन्हें अस्थायी पेसमेकर और रेस्पिरेटरी वेंटिलेटर पर रखा। डाक्टरों की निरंतर निगरानी में मरीज के हृदय. फेंफड़े और श्वसन तंत्र का इलाज किया गया और एक सप्ताह के भीतर उनकी हालत में चमत्कारिक सुधार देखने को मिला।डा. खेतावत ने बताया कि एक सप्ताह में ही डोंगरे के हृदय और फैंफ.ड़ों की हालत में सुधार को देखते हुये वेंटिलेटर हटा दिया गया और वह न केवल अपनी आंख खोलकर हाथ पैर चलाने लगे बल्कि उनके शरीर के अन्य अंगों में भी गतिशीलता देखने को मिली । उन्होंने बताया कि इतनी गंभीर हालत में लाये गये किसी मरीज में महज एक सप्ताह में इतना सुधार उन्होंने पहले कभी नहीं देखा । डा. खेतावत ने डाक्टरों की अथक मेहनत और मरीज की प्रतिरोधक क्षमता को इस चमत्कार का श्रेय दिया है।

Monday, December 29, 2008

पांच बरस में ले ली 98 हजार लोगों की जान

पिछले पांच साल से इराक में चल रही अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में अब तक रासायनिक हथियार तो नहीं मिले लेकिन सद्दाम हुसैन को हटाने की इस मुहिम के लिए पहले से ही मजहबी हिंसा के शिकार रहे इस देश के वाशिंदों ने भारी कीमत अदा की है। इराक में व्यापक विनाश के हथियारों की खोज के नाम पर तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को अपदस्थ करने के लिए वर्ष 2003 में किए गए अमेरिकी हमले के बाद से अब तक 98 हजार मासूम लोगों की जान जा चुकी है।इराक युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या का पता लगाने के लिए यहां के मानवाधिकार संगठन 'इराक बॉडी कांउट' की शनिवार को जारी की गई रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर किए गए हैं।रिपोर्ट के अनुसार इराक में इस साल अब तक आठ से नौ हजार के बीच स्थानीय नागरिक मारे जा चुके हैं। हालांकि पिछले पांच साल में 2006-07 में सबसे ज्यादा 48 हजार लोगों के मारे जाने के बाद पिछले एक साल में अमेरिका और स्थानीय सरकार समर्थकों पर किए गए हमलों की संख्या में खासी गिरावट दर्ज की गई है।संगठन के सहसंस्थापक और प्रवक्ता जॉन स्लोबोदा ने बताया कि मरने वाले स्थानीय नागरिकों की संख्या में आई यह गिरावट बगदाद के आसपास के इलाकों में सबसे ज्यादा प्रभावी रही। उन्होंने बताया कि यह रिपोर्ट मीडिया एवं अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है इसलिए मृतकों की वास्तविक संख्या 98,400 से भी अधिक हो सकती है।

आतंकवादियों के खिलाफ पाकिस्तान कुछ कारवाई करे

अमेरिका और ब्रिटेन ने मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों में पाकिस्तानी तत्वों के शामिल होने के ठोस सबूत मुहैया कराए हैं लेकिन पाकिस्तान कुछ करने के बजाय अनिर्णय की स्थिति में दिखाई दे रहा है।अमेरिकी और ब्रिटिश अधिकारियों ने मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों और उन्हें निर्देशित कर रहे पाकिस्तान में मौजूद उनके आकाओं के बीच उपग्रह और मोबाइल के जरिए हुई बातचीत को सौंपा था। पश्चिमी राजनयिकों का मानना है कि इस्लामाबाद ने उनके द्वारा दी गई खुफिया जानकारियों पर कुछ खास नहीं किया है और वे चाहते हैं कि 26 नवंबर को हमला करने वाले लोगों के पीछे मौजूद लोगों के खिलाफ पारदर्शी तरीके से कार्रवाई की जाए।राजनयिक सूत्रों ने बताया कि मुंबई हमलों के बाद ब्रिटिश और अमेरिकी जांचकर्ताओं ने काफी मात्रा में तकनीकी और अन्य खुफिया जानकारियां जुटाई थी जिन्हें बाद में पाकिस्तान को सौंप दिया गया था।

अब कूदो 30 हजार फीट ऊंचाई से

डीआरडीओ ने ऐसा पैराशूट तैयार किया है, जिसकी मदद से जवान अब 30,000 फुट की ऊंचाई से कूद सकते हैं। आम तौर पर जवान 10,000 फुट की ऊंचाई से जंप करते हैं। लेकिन अडवांस्ड कार्रवाई के दौरान रक्षा बल इस नए पैराशूट का इस्तेमाल करेंगे। फायदा यह होगा कि 30,000 फुट से जंप करने पर दुश्मन को इसकी भनक तक नहीं लग पाएगी, क्योंकि इतनी ऊंचाई से एयरक्राफ्ट की आवाज सुनाई नहीं देगी। नया पैराशूट ऑक्सिजन सिलिंडर से लैस रहेगा, ताकि घुटन को रोका जा सके क्योंकि इतनी ऊंचाई पर ऑक्सिजन की कमी हो जाती है। एयरक्राफ्ट से कूदने के बाद लगभग 45 मिनट तक जरूरत के हिसाब ऑक्सिजन मिलती रहेगी।

Sunday, December 21, 2008

महात्मा गांधी ब्रिटीश सेना की एम्बूलेंस यूनिट में करते थे काम : रक्षा मंत्रालय

रक्षा मंत्रालय से निकलने वाली पत्रिका सैनिक समाचार के आगामी 2 जनवरी 2009 को सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में एक स्मारिका प्रकाशित की जा रही है, जिसमें इतिहास के अनेक दुर्लभ तथ्यों के बीच एक हैरतंगेज बात यह भी सामने आई है कि महात्मा गांधी 1889 में ब्रिटिश सेना में शामिल हुए थे और उन्होंने इसकी एम्बुलेंस यूनिट में काम किया था। अहिंसा का पुजारी फौजी वर्दी में और वह भी उस देश की फौज में जिसके साम्राज्य के पतन का बीड़ा उन्होंने खुद जीवनभर उठाए रखा। यह बात यकीन से परे लगती है, लेकिन इतिहास और महात्मा गांधी से जुड़ा यह तथ्य बेहद कम प्रकाश में आया। लेकिन इस तथ्य को रक्षा मंत्रालय ने नए सिरे से उजागर किया है। और तो और रक्षा मंत्रालय ने ब्रिटिश फौज की वर्दी पहने मोहन दास करम चंद गांधी के चित्र को भी प्रकाशित किया हैं। अफ्रीका में अंग्रेज बोएर जंग की समाप्ति पर मोहनदास करमचंद गांधी को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पदक से भी सम्मानित किया गया था। सैनिक समाचार की इस स्मारिका में प्रकाशित लेख के अनुसार महात्मा गांधी का फौज में शामिल होना और अपने फौजी के तौर पर गांधी को स्वीकार कर लेना महात्मा और ब्रिटिशों दोनों के लिए कठिन फैसला था लेकिन परिस्थितियों ने ऐसा होने के लिए बाध्य कर दिया। कहते हैं कि ब्रिटिश फौज की इस एम्बुलेंस इकाई के गठन का सुझाव भी महात्मा गांधी का ही था और ब्रिटिशों ने इस पर ठहाके भी लगाए थे लेकिन नटाल के गवर्नर गांधी जी के हमदर्द थे और उनके मार्फत महात्मा गांधी डाक्टर प्रसिद्ध डाक्टर बूथ की सेवाएं लेने में कामयाब हो गए और उन्होंने इस इकाई को प्रशिक्षित किया। महात्मा गांधी ब्रिटिश फौज में क्यों शामिल हुए और इसके पीछे उनका मकसद क्या था इसकी सच्चाई के बारे में सैनिक समाचार की शताब्दी स्मारिका में कहा गया है कि बोएर के दो गणराज्यों में ब्रिटिशों से आजादी के लिए जब जंग छिड़ी तो वहां अंग्रेज कमजोर स्थिति में थे और अफ्रीकी बोएर की 48000 की फौज के सामने उनके पास महज 27 हजार फौजी ही थे। ऐसे में ब्रिटिशों को अपने सर्वश्रेष्ठ जनरलों को लड़ाई में उतारना पड़ा। इसी दौरान मोहनदास करमचंद गांधी ने एम्बूलेंस यूनिट के गठन की बात सोची थी। उस समय भारतीयों और ब्रिटिशों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। लेकिन आखिरकार इस यूनिट का गठन हो गया। महात्मा गांधी जिस एम्बूलैंस यूनिट में थे उसमें 1100 भारतीय थे, जिनमें 800 गिरमिटिया मजदूर थे। इस यूनिट बेहद बहादुरी से काम किया था और ब्रिटेन की सेना के कमांडर इन चीफ ने उनके शौर्य की गाथाएं दर्ज की थीं।