अगर आपका बच्चा सेलफोन का इस्तेमाल करता है या विडियो गेम्स खेलता है तो इससे उसकी पढ़ाई पर असर नहीं पड़ेगा। क्या चौंक गए? स्पेन में हुई एक स्टडी बताती है कि 12 साल तक के बच्चों की पढ़ाई पर सेलफोन के इस्तेमाल से कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि रिसर्चरों ने विडियो गेम्स खेलने और कमतर ग्रेड पाने में संबंध पाया है, लेकिन यह भी देखा गया कि विडियो गेम्स खेलने से मैथ्स सीखने की क्षमता पर फर्क नहीं पड़ता। बच्चे देख-देखकर भी कुछ ऐसी स्किल सीखते हैं, जिन्हें साइंस, टेक्नॉलजी, मैथ्स, इंजीनियरिंग आदि के लिए 'ट्रेनिंग' के तौर पर माना जाता है। इन स्किल्स को सीखने में विडियो गेम्स खेलने का अच्छा असर पड़ता है। इस स्टडी से जुड़ीं मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी की साइकॉलजी की प्रोफेसर लिंडा जैकसन कहती हैं, आज ज्यादातर पैरंट्स अपने बच्चों को इन्हीं क्षेत्रों में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। सर्वे में पाया गया कि लड़कियों की रुचि सेलफोन में ज्यादा है, जबकि लड़कों की विडियो गेम में। तीन साल तक चली यह स्टडी इंटरनैशनल असोसिएशन फॉर डिवेलपमेंट ऑफ द इन्फर्मेशन ससायटी ने प्रकाशित की है। गेम्स में हो फाइट, तो नजर रहेगी ब्राइट विडियो गेम्स सिर्फ बच्चों ही नहीं, बड़ों के लिए भी काम की चीज हैं। एक नई स्टडी में बताया गया है कि मारधाड़ वाले विडियो गेम्स खेलने से आंख की एक खास क्षमता बढ़ती है। खास तौर पर विरोधी को मारने वाले गेम्स खेलने से प्रकाश और अंधकार के बदलावों को देखने की क्षमता का विकास होता है। रिसर्चरों का कहना है कि आंखों के लिए यह क्षमता जरूरी है, क्योंकि कुछ हालात में इससे नजर तेज होती है। मसलन, रात में सड़क पर रोशनी कम हो और आप ड्राइविंग कर रहे हों तो यही क्षमता आपके बहुत काम आती है। सामान्य हालात में यह क्षमता उम्र के साथ घटती जाती है। ब्रिटिश अखबार 'डेली टेलिग्राफ' में छपी खबर के अनुसार, न्यू यॉर्क की रॉचिस्टर यूनिवर्सिटी, गोल्डशेल्गर आई रिसर्च इंस्टिट्यूट और तेल अवीव यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने अपनी स्टडी के बाद यह जानकारी दी है। इस स्टडी को 'नेचर न्यूरोसाइंस' पत्रिका में छापा गया है। स्टडी में एक आयु वर्ग के विडियो गेम्स के अनुभवी खिलाडि़यों की इस तरह के गेम्स न खेलने वालों के समूहों से तुलना की गई। इसमें ऐक्शन गेम्स खेलने वाले वॉलंटियर्स की देखने की क्षमता में 43 से 58 फीसदी सुधार पाया गया। हाथ और आंख के ज्यादा इस्तेमाल न होने वाले गेम्स खेलने वालों में कोई बेहतरी नहीं नजर आई।
Tuesday, March 31, 2009
महत्वकांक्षी होती हैं कामकाजी महिलाएं
नई पीढ़ी की कामकाजी महिलाएं पुरूषों की तुलना में ज्यादा महत्वकांक्षी होती हैं। आजकल महिलाएं अपना परिवार चलाने के लिए पुरूषों के साथ काम तो करती ही हैं, साथ ही 26 प्रतिशत महिलाएं अपने पति से ज्यादा कमाती हैं। इसका खुलासा ‘यूएस नेशनल स्टडी ऑफ चेंजिंग वर्कफोर्स’ नामक रिपोर्ट में ‘फेमेली एंड वर्क इंस्टीट्यूट’ के द्वारा किया गया।‘यूएस नेशनल स्टडी ऑफ वर्कफोर्स’ के यह अध्ययन रोजगार और परिवार, पुरूष और महिलाओं की घरेलू और कार्य स्थल के प्रति नजरिए पर केंद्रित था, साथ ही अन्य कार्य और जीवन से जुड़े कई मुद्दों पर आधारित थे। इस तरह का अध्ययन सन 1977 में टेलीफोन के जरिए किया गया था, जिसमें भी इसी तरह के कई छोटे-छोटे मुद्दों को आधार बनाया गया था।
Sunday, March 29, 2009
बेटी को तहखाने में कैद कर लगातार 24 साल तक बलात्कार
कोलंबिया की एक महिला ने अपने पिता पर पिछले 20 साल से रेप करने का आरोप लगाया और दावा किया कि इससे उसे 8 बच्चे हुए हैं। कोलंबिया के दक्षिण-पश्चिम शहर तोलिमा में रहने वाले बलात्कारी पिता आर्सेदियो अल्वारेज (58 साल) की बेटी 32 वर्षीय अल्बा अल्वारेज के बारे में कहा गया है कि अर्सेदियो ने जब अल्बा की बेटियों के साथ भी दुष्कर्म करने का प्रयास शुरू किया तो उसने अपने पिता की शिकायत की। अल्बा ने टीवी पर जब ऑस्ट्रिया के रेपस्टि बाप फ्रित्जल के हाथों एलिसाबेथ की कहानी देखी-सुनी तो उसे लगा कि उसके साथ भी गलत हो रहा है और उसे भी अपने बाप के खिलाफ शिकायत करनी चाहिए।
आरोपी को शनिवार को पकड़ लिया गया है और उससे पूछताछ की जा रही है। वैसे, उसने खुद को निर्दोष बताया है। 35 वर्षीय अल्बा ने कहा कि जब उसकी मां का निधन हुआ, उस समय वह महज 5 साल की थी। मगर तभी से उसके पिता ने उसके साथ मुंह काला करना शुरू कर दिया था। वह 14 बार गर्भवती हुई, हालांकि 6 बार उसका गर्भपात हो गया। बाकी 8 बच्चे एक साल से लेकर 19 साल के हैं। फ्रित्जल ने अपनी ही बेटी को तहखाने में कैद कर लगातार 24 साल तक बलात्कार किया जिसके परिणामस्वरूप 7 बच्चे हुए। फ्रित्जल को अदालत ने उम्रकैद की सजा दी है।
आरोपी को शनिवार को पकड़ लिया गया है और उससे पूछताछ की जा रही है। वैसे, उसने खुद को निर्दोष बताया है। 35 वर्षीय अल्बा ने कहा कि जब उसकी मां का निधन हुआ, उस समय वह महज 5 साल की थी। मगर तभी से उसके पिता ने उसके साथ मुंह काला करना शुरू कर दिया था। वह 14 बार गर्भवती हुई, हालांकि 6 बार उसका गर्भपात हो गया। बाकी 8 बच्चे एक साल से लेकर 19 साल के हैं। फ्रित्जल ने अपनी ही बेटी को तहखाने में कैद कर लगातार 24 साल तक बलात्कार किया जिसके परिणामस्वरूप 7 बच्चे हुए। फ्रित्जल को अदालत ने उम्रकैद की सजा दी है।
बिना आईएमईआई नम्बर वाले बंद होंगे चाइनीज मोबाइल
सेलुलर सर्विस देने वाली कंपनियों ने अपने ग्राहकों से कहा है कि अगर वे इस तरह के फोन इस्तेमाल करते हैं, तो उनका कनेक्शन काट दिया जाएगा। 15 अंकों वाला आईएमईआई नंबर हर फोन की खास पहचान होता है, लेकिन कई चाइनीज फोन बिना इस नंबर के हैं। ऐसे फोन से होने वाली कॉल को ट्रेस करना मुश्किल होता है और सरकार को डर है कि इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। टेलिकॉम डिपार्टमंट ने सभी ऑपरेटरों से कहा था कि बिना इस नंबर वाले फोन के कनेक्शन काट दिए जाएं। इसके लिए उन्हें 31 मार्च तक की डेडलाइन दी गई है। कंपनियों को 15 अप्रैल तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। ऐसा न करने पर कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, सरकार पहले भी यह डेडलाइन आगे बढ़ा चुकी है, ऐसे में देखना होगा कि पहली अप्रैल के बाद वह कितनी सख्ती करती है। सूत्रों के मुताबिक एक प्रमुख सेलुलर सर्विस कंपनी ने अपने ग्राहकों को इस बारे में एसएमएस भेज कर जानकारी देना शुरू कर दिया है। इसमें ग्राहकों से आग्रह किया गया है कि सेवाएं पाते रहने के लिए वे पहली अप्रैल से वैध मोबाइल हैंडसेट इस्तेमाल करना शुरू कर दें। डॉट ने सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों से कहा है कि वे अपने नेटवर्क को इक्विपमंट आइडेंटिटी रजिस्टर से लैस करें, ताकि जब भी किसी फोन से कॉल की जाए, उसका आईएमईआई नंबर ट्रेस किया जा सके। सरकार की इस सख्ती से मोबाइल कंपनियां खुश हैं, क्योंकि चाइनीज माल ने उनके बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। इंडियन सेलुलर असोसिएशन के प्रेजिडंट पंकज महिंद्रू के मुताबिक बिना आईएमईआई के फोन उसी तरह है जैसे बिना नंबर की गाड़ी। इनके इम्पोर्ट पर भी पाबंदी लगनी चाहिए, मोबाइल इंडस्ट्री सरकार के साथ है। नोकिया इंडिया के डाइरेक्टर (कॉर्परेट अफेयर) अंबरीश बकाया के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती होने के अलावा ये फोन सेफ्टी स्टैंडर्ड पर भी खरे नहीं उतरते हैं, इस बारे में ग्राहकों को जागरूक किए जाने की जरूरत है। जानकारों के मुताबिक देशभर में बिना आईएमईआई नंबर के करीब एक करोड़ से डेढ़ करोड़ तक फोन इस्तेमाल हो रहे हैं। देशभर में 35 करोड़ मोबाइल यूजर हैं। सेलुलर सर्विस कंपनियां एक झटके में इतने सारे ग्राहक गंवाने का रिस्क नहीं लेना चाहती। उनकी इस दिक्कत को देखते हुए सरकार ऐसे कनेक्शन कट करने के लिए डेडलाइन पहले भी कई बार आगे बढ़ा चुकी है। इससे पहले 6 जनवरी की डेडलाइन थी। सूत्रों के मुताबिक बाजार में इस तरह के सॉफ्टवेयर भी डिवेलप किए जा रहे हैं जिनसे फेक फोन पर आईएमईआई नंबर लाया जा सकता है, लेकिन इनकी विश्वसनीयता पर अभी सवाल बने हुए हैं।
Saturday, March 28, 2009
किशोरी के साथ गैंग रेप
सूरत में 10 दिनों के अंतराल में बलात्कार की दूसरी घटना प्रकाश में आई है। 11 वर्षीय नाबालिक लड़की का अपहरण कर तीन लड़को ने मुंह काला किया
सूरत के पाल रोड पर स्थित तक्षशिला अपार्टमेंट में रहने वाले उंजल सिंह नेपाली के दो बच्चे शनिवार दोपहर घर से बाहर खेल रहे थे, तभी अचानक ऑटो रिक्शा से सवार तीन युवक आए और दोनों को उठा ले गए। इन दरिंदों ने लड़की के भाई को थोड़ी दूर पर चलती गाड़ी से फेंक दिया, जो अस्पताल में भर्ती है। लेकिन शहर से कुछ दूर पर लड़की को ले जाकर उसके मुंह में पट्टी बांधकर तीनों ने बारी-बारी से रेप किया। लड़की की हालत नाजुक बनी हुई है।
पीड़ित लड़की के पिता उंजल सिंह नेपाली जो कि एक गार्ड का काम करते हैं, ने पुलिस को बताया कि उनकी लड़की और बड़ा लड़का घर के बाहर खेल रहे थे, तभी तीन लोग आए और उन्हें जबरन उठा ले गए। लड़के को तो थोड़ी दूर पर ही फेंक दिया लेकिन लड़की को जंहागीरापुरा-डांडी रोड़ पर टिंबर मार्ट के नजदीक ले गए और वहां पर उसके साथ मुंह काला किए। लड़की को खून से लथपथ अवस्था में वहां पाया गया।
पुलिस के अनुसार, हम मामले की छानबीन कर रहे हैं, आरोपियों की धरपकड़ के लिए हमने अभियान चला रखा है और जल्द ही इस गैंग रेप में शामिल सभी आरोपी हमारे शिकंजे में होंगे। पुलिस ने बताया कि लड़की को शनिवार के दिन करीब दिन के दो बजे टिंबर मार्ट इलाके में पाया गया। उस समय लड़की को ब्लीडिंग हो रही थी जिसके बाद उसे आनन-फानन में पास के अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है।
19 मार्च को भी नाबालिग के साथ रेप
जानकारी के मुताबिक ठीक इसी तरह की घटना 19 मार्च के दिन इसी इलाके में 9 साल की नाबालिक लड़की को उसके ही पड़ोसी ने मात्र 10 रूपए का लालच देकर बलात्कार किया। यहां पर भी लड़की की हालत गंभीर बनी हुई है।
सूरत के पाल रोड पर स्थित तक्षशिला अपार्टमेंट में रहने वाले उंजल सिंह नेपाली के दो बच्चे शनिवार दोपहर घर से बाहर खेल रहे थे, तभी अचानक ऑटो रिक्शा से सवार तीन युवक आए और दोनों को उठा ले गए। इन दरिंदों ने लड़की के भाई को थोड़ी दूर पर चलती गाड़ी से फेंक दिया, जो अस्पताल में भर्ती है। लेकिन शहर से कुछ दूर पर लड़की को ले जाकर उसके मुंह में पट्टी बांधकर तीनों ने बारी-बारी से रेप किया। लड़की की हालत नाजुक बनी हुई है।
पीड़ित लड़की के पिता उंजल सिंह नेपाली जो कि एक गार्ड का काम करते हैं, ने पुलिस को बताया कि उनकी लड़की और बड़ा लड़का घर के बाहर खेल रहे थे, तभी तीन लोग आए और उन्हें जबरन उठा ले गए। लड़के को तो थोड़ी दूर पर ही फेंक दिया लेकिन लड़की को जंहागीरापुरा-डांडी रोड़ पर टिंबर मार्ट के नजदीक ले गए और वहां पर उसके साथ मुंह काला किए। लड़की को खून से लथपथ अवस्था में वहां पाया गया।
पुलिस के अनुसार, हम मामले की छानबीन कर रहे हैं, आरोपियों की धरपकड़ के लिए हमने अभियान चला रखा है और जल्द ही इस गैंग रेप में शामिल सभी आरोपी हमारे शिकंजे में होंगे। पुलिस ने बताया कि लड़की को शनिवार के दिन करीब दिन के दो बजे टिंबर मार्ट इलाके में पाया गया। उस समय लड़की को ब्लीडिंग हो रही थी जिसके बाद उसे आनन-फानन में पास के अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है।
19 मार्च को भी नाबालिग के साथ रेप
जानकारी के मुताबिक ठीक इसी तरह की घटना 19 मार्च के दिन इसी इलाके में 9 साल की नाबालिक लड़की को उसके ही पड़ोसी ने मात्र 10 रूपए का लालच देकर बलात्कार किया। यहां पर भी लड़की की हालत गंभीर बनी हुई है।
टेलीपैथी ने बचाई जान
जुड़वां भाई-बहनों बीच कई बातें एक जैसी होती हैं। उनका चेहरा, व्यवहार काफी हद तक एक-दूसरे से मिलता-जुलता है लेकिन टेलीपैथी के जरिए एक-दूसरे के मन की बात को समझ लेना सारे जुड़वां में सामान्य नहीं है। ऐसी ही एक अनोखी घटना घटी विगन के अर्थटन में जब एक बहन ने अपनी जुड़वां बहन की जान टेलीपैथी के जरिए बचाई। उसके सिक्स्थ सेंस ने उसे बहन के खतरे में होने के संकेत दे दिए थे।
कैसे बची जान
जेमा हॉगटन (15) के सिक्स्थ सेंस ने उसे आगाह किया कि उसकी जुड़वां बहन लीने की जान खतरे में है। वह बाथरूम की ओर भागी, जहां लीने बाथ टब में उलटी लेटी हुई थी, पहले तो जेमा को लगा कि लीने अपने बालों को धो रही है या मजाक कर रही है, लेकिन उसने जैसे ही उसे उठाया उसका शरीर नीला पड़ चुका था और वह अजीबोगरीब आवाजें निकाल रही थी। जेमा ने सबसे पहले उसका प्राथमिक उपचार किया और तुरंत अस्पताल पहुंचाया। पैरामेडिक स्टीव पीयर्सन का कहना है कि यदि जेमा समय पर अपनी बहन की मदद करने नहीं पहुंचती तो उसकी मौत तय थी।
और भी हैं मामले
जेमा और लीने के अलावा दुनिया में कई ऐसे जुड़वां हैं, जिन्होंने टेलीपैथी की सच्चाई को स्वीकार किया है। उनमें सिंगर रॉबिन गिस भी शामिल हैं। उन्होंने माना कि उनके साथ भी एक बार ऐसा वाकया हो चुका है। एक बार बाइक दुर्घटना में बुरी तरह घायल होने पर उनके भाई ने उनकी जान बचाई थी और इस दुर्घटना के होने से पहले ही उनके भाई को इसका आभास हो गया था।
कैसे बची जान
जेमा हॉगटन (15) के सिक्स्थ सेंस ने उसे आगाह किया कि उसकी जुड़वां बहन लीने की जान खतरे में है। वह बाथरूम की ओर भागी, जहां लीने बाथ टब में उलटी लेटी हुई थी, पहले तो जेमा को लगा कि लीने अपने बालों को धो रही है या मजाक कर रही है, लेकिन उसने जैसे ही उसे उठाया उसका शरीर नीला पड़ चुका था और वह अजीबोगरीब आवाजें निकाल रही थी। जेमा ने सबसे पहले उसका प्राथमिक उपचार किया और तुरंत अस्पताल पहुंचाया। पैरामेडिक स्टीव पीयर्सन का कहना है कि यदि जेमा समय पर अपनी बहन की मदद करने नहीं पहुंचती तो उसकी मौत तय थी।
और भी हैं मामले
जेमा और लीने के अलावा दुनिया में कई ऐसे जुड़वां हैं, जिन्होंने टेलीपैथी की सच्चाई को स्वीकार किया है। उनमें सिंगर रॉबिन गिस भी शामिल हैं। उन्होंने माना कि उनके साथ भी एक बार ऐसा वाकया हो चुका है। एक बार बाइक दुर्घटना में बुरी तरह घायल होने पर उनके भाई ने उनकी जान बचाई थी और इस दुर्घटना के होने से पहले ही उनके भाई को इसका आभास हो गया था।
चुनावी दौर में मीडिया भी चला कमाई की ओर
सभी छोटे-बड़े मीडिया हाउसों ने लोकसभा चुनाव कवर करने के लिए रणनीति बना ली है। सबका लक्ष्य एक है- ज्यादा से ज्यादा पैसा उगाहो। चुनाव मीडिया के लिए रेवेन्यू जनरेशन का सबसे बड़ा पर्व बन चुका है। चुनाव आयोग ने चुनाव खर्च को लेकर जो बंदिशें प्रत्याशियों पर लगायी हैं, उसका तोड़ प्रत्याशियों व मीडिया प्रबंधकों ने मिल कर निकाल लिया है। अखबारों में अब प्रत्याशियों का विज्ञापन नहीं छपता, क्योंकि इस विज्ञापन का खर्च प्रत्याशी के चुनाव खर्च में जोड़ दिया जाता है। प्रत्याशी चुनावी खर्च कम रखने के लिए पत्रकारों व मीडिया हाउसों को मोटी रकम देकर विज्ञापन की जगह अखबारों के चुनाव पेज पर पॉजिटिव खबरें छपवाते हैं। कांटे के मुकाबले की एनालिसिस कराते हैं। इन खबरों में प्रत्याशी को मजबूती से लड़ते हुए बताया जाता है। उनके पक्ष में जगह-जगह भीड़ उमड़ने की बात कही जाती है। प्रत्याशी के भाषण को जनसभा की तसवीर के साथ छापा जाता है। जो प्रत्याशी लाखों रुपये नहीं खर्च कर पाते, वो चाहे लाख योग्य और जेनुइन कैंडीडेट हों, उन्हें अखबार के ‘इलेक्शन स्पेशल’ पेज पर सिंगल कालम तक जगह नहीं दी जाती। इस कारण कई ईमानदार प्रत्याशी मंच से ही पत्रकारों को दलाल और बिका हुआ कहने में गुरेज नहीं करते। ऐसा वाकया मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में घटित हो चुका है। प्रत्याशियों से ज्यादा से ज्यादा पैसा ऐंठने के लिए मीडिया हाउसों के प्रबंधकों ने न्यूज हैंडल करने वाले वरिष्ठों को तगड़ा टारगेट सौंप दिया है। हरियाणा के एक बड़े अखबार के ब्यूरो चीफ़ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें एक छोटे से जिले से लोकसभा चुनाव के दौरान 20 लाख रुपये निकालने का टारगेट दिया गया है। इस टारगेट को पूरा करने के लिए वे सभी दलों के प्रत्याशियों के हाथ-पांव जोड़ रहे हैं। इन प्रत्याशियों से पेड न्यूज की डील हुई है। इनसे लाखों रुपये लेकर चुनाव भर अखबार के चुनावी पेज पर पक्ष में खबरें प्रकाशित की जायेंगी। खबरों में किसी भी प्रत्याशी की सीधे हारता या जीतता नहीं दिखाना है। सभी प्रत्याशियों का टेंपो हाई रखना है, ताकि सभी से लाख- दो लाख रुपये वसूला जा सके। आप जब प्रत्याशियों से खबरों के नाम पर पैसे मांगेंगे, तो उनके खिलाफ़ चुनाव में ही नहीं, बल्कि चुनाव के बाद भी खबर लिखने में कलम कांपेंगी। उत्तराखंड के हल्द्वानी जिले का एक रिपोर्टर प्रबंधन के दबाव से परेशान है। उसका कहना है कि चुनाव में हर प्रत्याशी से ज्यादा से ज्यादा पैसा निकालने के प्रबंधन के दबाव से उसका सारा व प्रत्याशियों से पेड न्यूज के लिए डील करने में बीतता है। खबर के नाम पर केवल प्रेस रिलीज और इवेंट को ही भेजा जा रहा है। ऐसे माहौल में अखबारों से जन सरोकारवाली पत्रकारिता की उम्मीद करना बेमानी है। परफ़ारमेंस का पैमाना बड़ी खबर ब्रेक करना नहीं रह गया है। जो सबसे ज्यादा रेवेन्यू प्रबंधन को दिलायेगा, वही प्रबंधन की आंख का तारा बनेगा। एक अन्य अखबार के राष्ट्रीय ब्यूरो में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि चुनाव के वक्त उन लोगों को अलग-अलग पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं के साथ लगा दिया गया है। इन नेताओं से प्रबंधन की मोटी डील पहले ही हो चुकी है। इसके एवज में नेताओं को परमानेंट तौर पर एक नेशनल रिपोर्टर सुपुर्द कर दिया गया है, ताकि वे जहां भी जायें और जो भी बोलें, उसकी खबर अखबार में नियमित तौर पर चुनावी पेज पर प्रकाशित की जाये। ज्यादातर रिपोर्टर इस चुनावी महासमर में विज्ञापन के दबाव से जूझ रहे हैं। विज्ञापन विभाग का काम भी इनके सिर आ जाने से ये डबल दबाव में हैं। सूत्रों का कहना है कि कई रिपोर्टर सहर्ष विज्ञापन बटोरेने के काम में लगे हुए हैं, क्योंकि प्रबंधन विज्ञापन में इन्हें भी 15 से लेकर 30 फ़ीसदी तक कमीशन देता है। कई रिपोर्टर तो लोकसभा चुनाव के दौरान कमीशन के प में इतनी रकम कमा लेने की आस लगाये हैं, ताकि वे चारपहिया गाड़ी खरीद सकें। एक बड़़े अखबार में यूपी मार्केट के रेवेन्यू को हैंडल कर रहे एक वरिष्ठ प्रबंधक का कहना है कि पत्रकार आम तौर पर चुनाव के दिनों में नेताओं से पर्सनली ओबलाइज हो जाया करते हैं, लेकिन इसका लाभ मीडिया हाउस को नहीं मिलता। इसीलिए प्रबंधन ने पत्रकारों के लिए नियम बना दिया है कि विज्ञापन लाओ और तगड़ा कमीशन पाओ। इससे पत्रकारों की नंबर दो की कमाई को नंबर एक में बदल दिया जा रहा है। इससे पत्रकार और प्रबंधन दोनों को फ़ायदा है। इसे कैसे गलत कहा जा सकता है? उनसे जब पूछा गया कि आप सभी पत्रकारों को चोर समझते हैं, तो उनका कहना था कि आजकल ज्यादातर रिपोर्टर फ़ील्ड से अपने लिए ज्यादा से ज्यादा फ़ायदा जुटाते की फ़िराक में रहते हैं, कोई इसे स्वीकार कर लेता है और कोई इसे नहीं स्वीकारता। अगर पत्रकारों को रेवेन्यू जनरेशन से सीधा जोड़ दिया जा रहा है, तो पत्रकारों को नंबर एक में कमाने का अतिरि मौका मिल जाता है। यह तरीका सही है। रिपोर्टर अगर रेवेन्यू जनरेशन में जुट जायेगा, तो पत्रकारिता के सिद्धांतों का क्या होगा? इस सवाल पर प्रबंधक महोदय कहते हैं- पत्रकारिता के सिद्धांत की बातें किताबी होती हैं। कोई भी इसका पालन नहीं करता, केवल पब्लिक मंच से इस पर भाषण दिया जाता है और पत्रकारिता के छात्रों को उपदेश पढ़ाया जाता है। आज जब मार्केट इकोनामी पूरे उफ़ान पर है, हर आदमी अपने लिए ज्यादा से ज्यादा लाभ और सुविधाएं चाहता है। और यह चाहना गलत भी नहीं है। पत्रकारों के साथ दिक्कत यही है कि वे डबल स्टैंडर्ड रखते हैं। कहते कुछ और हैं और करते कुछ और। एक अखबार के जनरल डेस्क पर कार्य कर रहे वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि चुनाव पेज पर कौन सी खबरें पेड हैं और कौन सी नहीं, इसकी पहचान के लिए पेड खबरों पर ‘चुनाव समाचार’ या ‘चुनावी हालचाल’ का क्रॉसर लगा दिया जाता है, ताकि प्रबंधन और विज्ञापन विभाग को पता रहे कि इन खबरों के एवज में पैसा मिल चुका है। िपट्र जैसा हाल चैनलों का भी है। न्यूज चैनलों ने चुनाव विेषण और चुनावी खबरों के प्रसारण के लिए जिले-जिले के िस्ट्रगरों और राज्यों के ब्यूरो चीफ़ों को ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन लाने के निर्देश दे दिये हैं। स्टेट ब्यूरो के हेड को अलग से निर्देश दिया गया है कि वे चुनाव के जरिये अधिकतम रेवेन्यू जनरेट करने की योजना बनायें। सूत्रों का कहना है कि कई टीवी न्यूज चैनल ओपिनियन पोल के एवज में राष्ट्रीय पार्टियों से मोटी डील कर चुके हैं। लोकतंत्र का यह महापर्व भले ही देश के भविष्य के दशा-दिशा को तय करनेवाला होता है। पर इस महापर्व की आड़ में चौथा खंभा जिस तरह अपने बुनियादी दायित्वों को भुला कर पूरी तरह खाऊ-कमाऊ संस्कृति में लिप्त है, उसे लोकतंत्र और पत्रकारिता दोनों के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता। prabhat khabar
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