Sunday, December 21, 2008

महात्मा गांधी ब्रिटीश सेना की एम्बूलेंस यूनिट में करते थे काम : रक्षा मंत्रालय

रक्षा मंत्रालय से निकलने वाली पत्रिका सैनिक समाचार के आगामी 2 जनवरी 2009 को सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में एक स्मारिका प्रकाशित की जा रही है, जिसमें इतिहास के अनेक दुर्लभ तथ्यों के बीच एक हैरतंगेज बात यह भी सामने आई है कि महात्मा गांधी 1889 में ब्रिटिश सेना में शामिल हुए थे और उन्होंने इसकी एम्बुलेंस यूनिट में काम किया था। अहिंसा का पुजारी फौजी वर्दी में और वह भी उस देश की फौज में जिसके साम्राज्य के पतन का बीड़ा उन्होंने खुद जीवनभर उठाए रखा। यह बात यकीन से परे लगती है, लेकिन इतिहास और महात्मा गांधी से जुड़ा यह तथ्य बेहद कम प्रकाश में आया। लेकिन इस तथ्य को रक्षा मंत्रालय ने नए सिरे से उजागर किया है। और तो और रक्षा मंत्रालय ने ब्रिटिश फौज की वर्दी पहने मोहन दास करम चंद गांधी के चित्र को भी प्रकाशित किया हैं। अफ्रीका में अंग्रेज बोएर जंग की समाप्ति पर मोहनदास करमचंद गांधी को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पदक से भी सम्मानित किया गया था। सैनिक समाचार की इस स्मारिका में प्रकाशित लेख के अनुसार महात्मा गांधी का फौज में शामिल होना और अपने फौजी के तौर पर गांधी को स्वीकार कर लेना महात्मा और ब्रिटिशों दोनों के लिए कठिन फैसला था लेकिन परिस्थितियों ने ऐसा होने के लिए बाध्य कर दिया। कहते हैं कि ब्रिटिश फौज की इस एम्बुलेंस इकाई के गठन का सुझाव भी महात्मा गांधी का ही था और ब्रिटिशों ने इस पर ठहाके भी लगाए थे लेकिन नटाल के गवर्नर गांधी जी के हमदर्द थे और उनके मार्फत महात्मा गांधी डाक्टर प्रसिद्ध डाक्टर बूथ की सेवाएं लेने में कामयाब हो गए और उन्होंने इस इकाई को प्रशिक्षित किया। महात्मा गांधी ब्रिटिश फौज में क्यों शामिल हुए और इसके पीछे उनका मकसद क्या था इसकी सच्चाई के बारे में सैनिक समाचार की शताब्दी स्मारिका में कहा गया है कि बोएर के दो गणराज्यों में ब्रिटिशों से आजादी के लिए जब जंग छिड़ी तो वहां अंग्रेज कमजोर स्थिति में थे और अफ्रीकी बोएर की 48000 की फौज के सामने उनके पास महज 27 हजार फौजी ही थे। ऐसे में ब्रिटिशों को अपने सर्वश्रेष्ठ जनरलों को लड़ाई में उतारना पड़ा। इसी दौरान मोहनदास करमचंद गांधी ने एम्बूलेंस यूनिट के गठन की बात सोची थी। उस समय भारतीयों और ब्रिटिशों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। लेकिन आखिरकार इस यूनिट का गठन हो गया। महात्मा गांधी जिस एम्बूलैंस यूनिट में थे उसमें 1100 भारतीय थे, जिनमें 800 गिरमिटिया मजदूर थे। इस यूनिट बेहद बहादुरी से काम किया था और ब्रिटेन की सेना के कमांडर इन चीफ ने उनके शौर्य की गाथाएं दर्ज की थीं।